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सोवियत संघ ने अपना एटम बम क्यों बनाया था?

आज की दुनिया में एटम बम एक बड़ी मुसीबत बना हुआ है, लेकिन एटम बम बनने के बाद ही बड़े विश्व-युद्धों के दौर से दुनिया को मुक्ति मिली। जब दुनिया की महाशक्तियों को यह पता लग गया कि वे सचमुच, एक-दूसरे का पूरी तरह से ख़ात्मा कर सकती हैं तो इसके बाद उन्हें उन सवालों पर भी आपस में समझौते करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिन मुद्दों को लेकर पहले वे बड़ी आसानी से एक-दूसरे से भिड़ जाया करती थीं और लड़ाई शुरू हो जाती थी। 

परमाणु युग की शुरूआत में एटम बम पर अमरीका का एकाधिकार था। 1945 में अमरीका ने जापान पर दो एटम बम गिराए और यह दिखा दिया कि उन देशों के सामने कितना बड़ा खतरा उपस्थित हो गया है, जो पश्चिमी गुट में शामिल नहीं हैं। लेकिन 29 अगस्त 1949 को यह स्थिति बदल गई, जब सोवियत संघ ने अपने एटम बम का परीक्षण किया।

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हथियारबन्दी की दौड़ की शुरूआत 

पिछली सदी के चौथे दशक के अन्त में भौतिकशास्त्रियों ने पहली बार यह बात कही थी कि यूरेनियम के कणों के विखण्डन से होने वाली विशाल ऊर्जा का इस्तेमाल सैनिक उद्देश्यों से भी किया जा सकता है। और जर्मन वैज्ञानिकों ने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया। जर्मन वैज्ञानिकों ने ही दूसरे देशों के वैज्ञानिकों के मुक़ाबले सबसे पहले इस परमाणु सिद्धान्त पर बढ़-चढ़कर काम किया। 1939 की गर्मियों में जर्मनी में यह परमाणविक परियोजना शुरू कर दी गई। लेकिन हिटलर के सत्ता में आने के बाद वहाँ से भागे वैज्ञानिकों ने जल्दी ही यह समझ लिया कि यह परियोजना कितनी खतरनाक है। जर्मनी की नई सरकार जर्मन वैज्ञानिकों से यह माँग कर रही थी कि वे जल्दी से जल्दी इस परियोजना को पूरा करें। जितनी जल्दी यह परियोजना पूरी होगी, उतना अच्छा रहेगा। 

अगस्त 1939 में अमरीका के राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डेलानो रूज़वेल्ट को प्रमुख भौतिकशास्त्री अल्बर्ट आइंस्टाइन का एक पत्र मिला, जिसमें नोबल पुरस्कार विजेता आइंस्टाइन ने राष्ट्रपति का ध्यान इस ओर दिलाया था कि नाज़ीवादी एटमी हथियार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। आइंस्टाइन ने यह प्रस्ताव रखा था कि अमरीका को भी इस दिशा में कोशिश करनी चाहिए। इसके बाद दो साल तक अमरीकी वैज्ञानिक दिन-रात इस परियोजना में लगे रहे। नील्स बोर और एडवर्ड टेल्लेर जैसे अनेक बड़े वैज्ञानिकों को इस परियोजना से जोड़ लिया गया था और इस योजना में भारी मात्रा में धन का निवेश किया जा रहा था।

/ AP

सोवियत संघ को भी इस परियोजना के बारे में सारी जानकारियाँ मिल रही थीं। सोवियत भौतिकशास्त्री अमरीकी भौतिकशास्त्रियों के हर काम पर नज़र रखे हुए थे। खुफ़िया एजेंसियाँ भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी हुई थीं। जून 1940 में खुफ़िया एजेण्टों ने ख़बर दी कि अमरीका में यूरेनियम-235 पर शोध का काम शुरू हो गया है। इसके डेढ़ साल बाद, जब दूसरा विश्व-युद्ध शुरू हो चुका था, एक और चिन्ताजनक ख़बर मिली कि इंगलैण्ड 1943 तक एटम बम बनाकर तैयार कर सकता है। इसका मतलब यह था कि जर्मनी भी, जिसकी सेना मस्क्वा (मास्को) के सिर पर खड़ी हुई थीं, जल्दी ही एटम बम बना लेगा। परमाणु हथियारों की इस दौड़ में सोवियत संघ बुरी तरह से पिछड़ गया था।

वैज्ञानिक और ख़ुफ़िया एजेण्ट मोर्चे पर 

एटम बम के निर्माण से जुड़ी पश्चिमी देशों की सफलताओं की सारी सूचनाएँ क्रेमलिन पहुँच रही थीं। इओसिफ़ स्तालिन जल्दी ही यह समझ गए कि सोवियत संघ के लिए भी यह मुद्दा बड़ा महत्व रखता है। उन्होंने वैज्ञानिकों से कहा — हम ढंग से काम नहीं कर रहे, क्योंकि हम एटम बम नहीं बना पाए हैं। जर्मन सेना की बढ़त को मस्क्वा के समीप ही रोक दिया गया और जल्दी ही इस लड़ाई का रुख पूरी तरह से बदल गया। लेकिन इस बात की कोई गारण्टी नहीं थी कि यदि जर्मनी ने अपना एटम बम बना लिया तो द्वितीय विश्व-युद्ध का रूख फिर से नहीं पलट जाएगा। अमरीका और इंगलैण्ड की सफलताओं पर भी रूस को चिन्ता हो रही थी। एटम बम बनाकर वे पहले हिटलर का सफ़ाया करेंगे और उसके बाद सोवियत संघ के लिए खतरा बन जाएँगे। 

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सितम्बर 1942 में सोवियत नेताओं ने एक ऐसी विशेष प्रयोगशाला बनाने की अनुमति दे दी, जिसमें नाभिकीय समस्याओं पर काम किया जाएगा। इस प्रयोगशाला से ही सोवियत एटमी परियोजना का इतिहास शुरू होता है। इस प्रयोगशाला में भौतिकशास्त्री ईगर कुरचातफ़ के नेतृत्व में रूस के प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों के अनेक छोटे-छोटे दलों ने काम शुरू किया। बाद में इन्हीं ईगर कुरचातफ़ को ’सोवियत एटम बम का पिता’ कहा गया। सोवियत खुफ़िया एजेण्ट भी इन वैज्ञानिकों के साथ सहयोग कर रहे थे।

अमरीका में सक्रिय सोवियत गुप्तचरों का एक दल अमरीकी एटमी परियोजना की सारी ख़बरें इकट्ठी करके भेज रहा था। उन्हें इसकी भी जानकारी थी कि अमरीकी शोध प्रयोगशालाएँ कहाँ-कहाँ काम कर रही हैं। सोवियत संघ से सहानुभूति रखने वाले अमरीकी भौतिक-वैज्ञानिक भी पूरी जानकारी दे रहे थे। उनकी सहायता की बदौलत ही अमरीकी एटम बम के निर्माण से जुड़े सारे दस्तावेज़ ईगर कुरचातफ़ को मिल रहे थे। 1945 में एटम बम बनने के दो हफ़्ते बाद ही सोवियत संघ को यह जानकारी हो गई थी कि अमरीका ने एटम बम बना लिया है। 

अमरीकी एटमी एकाधिकार का अन्त

एटम बम के बग़ैर ही जर्मनी की फ़ासिस्ट सरकार को नेस्तानाबूद कर दिया गया। अगस्त 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर अमरीका द्वारा गिराए गए एटम बम बस, एक प्रतीकात्मक हमला थे। इस तरह अमरीका ने सारी दुनिया को यह जतला दिया था कि उसके पास भयानक और खतरनाक बम हैं। सबसे पहले अमरीका ने यह संकेत सोवियत संघ को दिया था। दूसरे विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद हिटलर विरोधी मित्र-देशों के गुट में शामिल देश दो अलग-अलग गुटों में बँट चुके थे। अमरीका और ब्रिटेन के जनरलों ने सोवियत संघ को नीचा दिखाने के लिए उसके साथ युद्ध करने की योजनाएँ बनानी शुरू कर दीं। उनका ख़याल था कि वे सोवियत संघ के बड़े शहरों पर एटम बम गिराकर सोवियत संघ को घुटने टेकने पर मजबूर कर देंगे। 

Maksim Blinov/RIA Novosti

अमरीका और ब्रिटेन की ओर से पैदा हुए इस खतरे से बचने का एक ही रास्ता था कि सोवियत संघ भी अपना एटम बम बना ले और एटम बम पर अमरीकी एकाधिकार को ख़त्म कर दे। हिरोशिमा के नष्ट होने के दो हफ़्ते बाद ही स्तालिन ने एक ऐसे विशेष आयोग की स्थापना की, जो एटमी परियोजना से जुड़े सारे काम की समीक्षा करके उसके बीच समन्वय रखेगी। यह आयोग एक ऐसा महामन्त्रालय था, जिसकी पहुँच देश के सभी संसाधनों तक थी और जिसके पास असीमित अधिकार थे। स्तालिन के सहयोगी लव्रेन्तीय बेरिया को इस आयोग का प्रमुख बनाया गया था।

इस आयोग के नेतृत्व में कुछ ही सालों के भीतर सोवियत संघ में एक नए उद्योग — परमाणु उद्योग की नींव रख दी गई। बहुत कम समय में ही यूरेनियम संवर्धन करने वाले कारख़ाने और रिएक्टर बना लिए गए। एटम बम बनाने का कारख़ाना भी स्थापित कर दिया गया। साइबेरिया में और उराल पर्वतमाला के इलाके में पहाड़ों के बीच अनेक नए उद्योग-परिसर उभर आए। इन उद्योग-परिसरों के चारों ओर ऐसे नए शहर बन गए, जिनका सोवियत संघ के नक़्शे पर कहीं नामोनिशान भी दिखाई नहीं देता था। इन शहरों के बारे में, इन प्रयोगशालाओं और उद्योग-परिसरों के बारे में सिर्फ़ वे ही लोग जानते थे, जो सोवियत परमाणु परियोजना से सीधे जुड़े हुए थे।

अमरीकी नेताओं को यह विश्वास था कि सोवियत वैज्ञानिक 1954 से पहले अपना एटम बम नहीं बना सकते। 1949 में सिमिपलातिन्स्क परीक्षण मैदान में जब सोवियत संघ ने अपना परमाणविक परीक्षण किया तो अमरीकियों के मुँह आश्चर्य से खुले के खुले रह गए। सारी दुनिया दंग हो गई। द्वितीय विश्व-युद्ध से बरबाद हुए सोवियत संघ ने एटम बम पर अमरीकी एकाधिकार को खत्म कर दिया था और इस तरह अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा की नींव रख दी थी, जिस पर ही आज नई विश्व व्यवस्था की इमारत खड़ी हुई है।

डॉ० अलिक्सान्दर विर्शीनिन — प्रसिद्ध रूसी इतिहासकार हैं और मस्क्वा राजकीय विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। वे समस्या विश्लेषण अनुसन्धान केन्द्र के प्रमुख विशेषज्ञ माने जाते हैं।

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